ऐसी कोई नियति नहीं जिसे तिरस्कार से जीता न जा सके।
ऐसी कोई नियति नहीं जिसे तिरस्कार से जीता न जा सके।
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शीत के बीच मैंने आख़िरकार जाना कि मेरे भीतर एक अजेय ग्रीष्म है।