व्लादिस्लाव पेत्कोविच दिस

और लज्जा से छिपने की चाह में मैं पीता हूँ, और चाहता हूँ कि सदा नशे में रहूँ; तब न पाप दिखता है, न उदासी में डूबा समाज, तब यह लज्जा भी नहीं दिखती कि मैं भी एक मनुष्य हूँ।

व्लादिस्लाव पेत्कोविच दिस, 1880–1917
और लज्जा से छिपने की चाह में मैं पीता हूँ, और चाहता हूँ कि सदा नशे में रहूँ; तब न पाप दिखता है, न उदासी में डूबा समाज, तब यह लज्जा भी नहीं दिखती कि मैं भी एक मनुष्य हूँ। — व्लादिस्लाव पेत्कोविच दिस

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