समझदार मनुष्य को उस काम में दख़ल देने में शर्म आती है जिसमें वह निपुण नहीं, जबकि मूर्ख को यह बड़ी शर्म की बात लगती है कि वह हर जगह अपनी नाक न घुसाए।
समझदार मनुष्य को उस काम में दख़ल देने में शर्म आती है जिसमें वह निपुण नहीं, जबकि मूर्ख को यह बड़ी शर्म की बात लगती है कि वह हर जगह अपनी नाक न घुसाए।
इसी लेखक के और इनसे जुड़े विषयों पर।
हम मनुष्य उन पक्षियों जैसे हैं जो हमेशा उन्हीं जालों में फँसते हैं और फिर भी नहीं सुनते।
आलस्य, निठल्लेपन और काहिली से अधिक शर्मनाक कोई धंधा नहीं है।