वहाँ आगे बढ़ो जहाँ तुम्हें कोई रोक न सके; वहाँ पीछे हटो जहाँ तुम्हें कोई पकड़ न सके।
वहाँ आगे बढ़ो जहाँ तुम्हें कोई रोक न सके; वहाँ पीछे हटो जहाँ तुम्हें कोई पकड़ न सके।
इसी लेखक के और इनसे जुड़े विषयों पर।
इस संभावना पर मत टिको कि शत्रु नहीं आएगा, बल्कि उसका सामना करने की अपनी तैयारी पर।
अच्छी सेना पहले स्वयं को अजेय बनाती है, फिर उस क्षण की प्रतीक्षा करती है जब शत्रु को हराया जा सके।
अपने को हार से बचाना हमारे हाथ में है, पर शत्रु को हराने का अवसर स्वयं शत्रु देता है।
बहुत गणना जीत की ओर ले जाती है और थोड़ी गणना हार की ओर: तो बिना गणना के क्या होगा!