एपिक्टेटस

क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती कि तुम अपना मन हर मिलने वाले के वश में दे देते हो, कि वह गाली दे तो मन विचलित और व्याकुल हो जाए?

एपिक्टेटस, 50–135
क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती कि तुम अपना मन हर मिलने वाले के वश में दे देते हो, कि वह गाली दे तो मन विचलित और व्याकुल हो जाए? — एपिक्टेटस

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