मुखिया जोसेफ़

मेरी बात सुनो, मेरे मुखियाओ! मैं थक गया हूँ; मेरा हृदय रोगी और उदास है। सूरज अभी जहाँ खड़ा है, वहाँ से मैं फिर कभी नहीं लड़ूँगा।

मुखिया जोसेफ़, 1840–1904
मेरी बात सुनो, मेरे मुखियाओ! मैं थक गया हूँ; मेरा हृदय रोगी और उदास है। सूरज अभी जहाँ खड़ा है, वहाँ से मैं फिर कभी नहीं लड़ूँगा। — मुखिया जोसेफ़

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