मार्कस ऑरेलियस

यही मत सोचो कि जीवन रोज़ घट रहा है और उसका थोड़ा ही भाग बचा है, बल्कि यह भी कि यह निश्चित नहीं कि बुद्धि चीज़ों को समझने लायक़ बलवान बनी रहेगी।

मार्कस ऑरेलियस, 121–180
यही मत सोचो कि जीवन रोज़ घट रहा है और उसका थोड़ा ही भाग बचा है, बल्कि यह भी कि यह निश्चित नहीं कि बुद्धि चीज़ों को समझने लायक़ बलवान बनी रहेगी। — मार्कस ऑरेलियस

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