जहाँ क़ानून नहीं, वहाँ स्वतंत्रता नहीं।
जहाँ क़ानून नहीं, वहाँ स्वतंत्रता नहीं।
इसी लेखक के और इनसे जुड़े विषयों पर।
यहाँ किसी भी मनुष्य का ज्ञान उसके अनुभव से आगे नहीं जा सकता।
हर सूदख़ोर और बदमाश कुछ सिक्कों में अपने लिए ‘महान जन-देशभक्त’ की उपाधि ख़रीद सकता था।
युद्ध का प्रचार अंततः मनुष्यों की जगह शैतानी अमूर्तताओं को रखने तक सिमट जाता है।