ब्रानिस्लाव नुशिच

तुम्हारे लिए अच्छा होगा, नौजवान, कि तुम न लिखो। लिखने ने ही तुम्हें जेल पहुँचाया है। अगर तुम अनपढ़ होते, तो आज शायद एक भले, ईमानदार आदमी और शायद सम्मानित नागरिक होते, पर अब तुम जुआरी की तरह एक जेल से दूसरी जेल घिसटते फिरते हो।

ब्रानिस्लाव नुशिच, 1864–1938
तुम्हारे लिए अच्छा होगा, नौजवान, कि तुम न लिखो। लिखने ने ही तुम्हें जेल पहुँचाया है। अगर तुम अनपढ़ होते, तो आज शायद एक भले, ईमानदार आदमी और शायद सम्मानित नागरिक होते, पर अब तुम जुआरी की तरह एक जेल से दूसरी जेल घिसटते फिरते हो। — ब्रानिस्लाव नुशिच

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