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दुनिया बदलने वालों के शब्द: विचारक, वैज्ञानिक, लेखक और राजनेता।

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हर आत्मा अमर है।

प्लेटो, 428–348 ई.पू.

जब तक दार्शनिक अपने नगरों के राजा नहीं बनते, या जिन्हें आज राजा और शासक कहा जाता है वे सचमुच दार्शनिक नहीं बनते, तब तक नगरों को उनकी बुराइयों से मुक्ति नहीं मिलेगी।

प्लेटो, 428–348 ई.पू.

न्याय ऐसा शुभ है जिसे केवल उसके पुरस्कारों और परिणामों के लिए नहीं, बल्कि उसके अपने लिए भी मूल्यवान मानना चाहिए।

प्लेटो, 428–348 ई.पू.

अन्याय मनुष्य की आत्मा में कलह लाता है, जबकि न्याय उसमें व्यवस्था और सामंजस्य स्थापित करता है।

प्लेटो, 428–348 ई.पू.

न्यायी मनुष्य अपने आंतरिक जीवन को व्यवस्थित करता है, वह अपना स्वामी होता है और अपने आप से शांति में रहता है।

प्लेटो, 428–348 ई.पू.

न्याय है अपना काम करना और दूसरों के काम में दख़ल न देना।

प्लेटो, 428–348 ई.पू.

मृत्यु का भय ज्ञान के दिखावे के सिवा कुछ नहीं है, क्योंकि यह वह जानने का भ्रम है जो हम नहीं जानते।

सुकरात, 470–399 ई.पू.

अन्याय का बदला कभी अन्याय से नहीं देना चाहिए, न किसी का बुरा करना चाहिए, चाहे हमने कितना ही बुरा सहा हो।

सुकरात, 470–399 ई.पू.

लगता है, मैं इस व्यक्ति से इस बात में अधिक बुद्धिमान हूँ: यद्यपि हममें से कोई भी सुंदर और शुभ कुछ नहीं जानता, वह न जानते हुए भी सोचता है कि वह कुछ जानता है, जबकि मैं, जैसे नहीं जानता, वैसे ही यह भी नहीं सोचता कि जानता हूँ।

सुकरात, 470–399 ई.पू.

सद्गुण होना ही काफ़ी नहीं; उसका उपयोग भी करना चाहिए।

सिसेरो, 106–43 ई.पू.

नैतिक सद्गुण आदत का परिणाम होता है।

अरस्तू, 384–322 ई.पू.

मित्रता प्रेम पाने से अधिक प्रेम करने में निहित लगती है।

अरस्तू, 384–322 ई.पू.

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