संग्रह
सूक्तियाँ
छोटे और तीखे विचार, जो एक ही वाक्य में सब कुछ कह देते हैं।
128 सूक्तियाँ
दर्शन
ज्ञान का पहला क़दम है सबको दोष देना; अंतिम, सबसे मेल कर लेना।
साधारण मन हमेशा प्रचलित राय और प्रचलित फ़ैशन के अनुरूप चलता है।
तर्क किसी मनुष्य से वह ग़लत राय नहीं छुड़वा सकता, जो उसने तर्क से पाई ही नहीं।
हमारे पास घृणा करने भर का धर्म है, पर एक-दूसरे से प्रेम करने भर का नहीं।
जो राजा को मारता है और जो उसके लिए मरता है, दोनों समान रूप से मूर्तिपूजक हैं।
जंगली मनुष्य लकड़ी और पत्थर की मूर्तियों के आगे झुकता है; सभ्य मनुष्य हाड़-मांस की मूर्तियों के आगे।
नौकरशाही कर्मचारियों से बनी है; अभिजात वर्ग मूर्तियों से; लोकतंत्र मूर्तिपूजकों से।
यदि तुम देर तक खाई में झाँकते हो, तो खाई भी तुममें झाँकती है।
जीवन पीड़ा और ऊब के बीच एक लोलक की तरह आगे-पीछे झूलता रहता है।