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सूक्तियाँ

छोटे और तीखे विचार, जो एक ही वाक्य में सब कुछ कह देते हैं।

128 सूक्तियाँ

दर्शन

ज्ञान का पहला क़दम है सबको दोष देना; अंतिम, सबसे मेल कर लेना।

गेओर्ग क्रिस्टोफ़ लिख़्टेनबर्ग, 1742–1799

साधारण मन हमेशा प्रचलित राय और प्रचलित फ़ैशन के अनुरूप चलता है।

गेओर्ग क्रिस्टोफ़ लिख़्टेनबर्ग, 1742–1799

तर्क किसी मनुष्य से वह ग़लत राय नहीं छुड़वा सकता, जो उसने तर्क से पाई ही नहीं।

जोनाथन स्विफ़्ट, 1667–1745

हमारे पास घृणा करने भर का धर्म है, पर एक-दूसरे से प्रेम करने भर का नहीं।

जोनाथन स्विफ़्ट, 1667–1745

जो मनुष्य तर्क की सुनता है, वह खो जाता है: तर्क उन सबको दास बना लेता है जिनका मन उस पर शासन करने लायक़ मज़बूत नहीं।

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, 1856–1950

जो राजा को मारता है और जो उसके लिए मरता है, दोनों समान रूप से मूर्तिपूजक हैं।

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, 1856–1950

जंगली मनुष्य लकड़ी और पत्थर की मूर्तियों के आगे झुकता है; सभ्य मनुष्य हाड़-मांस की मूर्तियों के आगे।

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, 1856–1950

नौकरशाही कर्मचारियों से बनी है; अभिजात वर्ग मूर्तियों से; लोकतंत्र मूर्तिपूजकों से।

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, 1856–1950

यदि तुम देर तक खाई में झाँकते हो, तो खाई भी तुममें झाँकती है।

फ़्रेडरिक नीत्शे, 1844–1900

मूर्खतापूर्ण निरंतरता छोटे मनों का हौआ है।

राल्फ़ वाल्डो एमर्सन, 1803–1882

जीवन पीड़ा और ऊब के बीच एक लोलक की तरह आगे-पीछे झूलता रहता है।

आर्थर शोपेनहावर, 1788–1860

तथ्य नहीं होते, केवल व्याख्याएँ होती हैं।

फ़्रेडरिक नीत्शे, 1844–1900

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