संग्रह
सूक्तियाँ
छोटे और तीखे विचार, जो एक ही वाक्य में सब कुछ कह देते हैं।
128 सूक्तियाँ
हास्य
आत्म-सम्मान: यह निश्चिंत भावना कि अभी तक किसी को शक नहीं हुआ।
सफल मनुष्य बस वह है जो एक ही तरह से लगातार दो-तीन बार से अधिक अपनी हँसी नहीं उड़वाता।
हर असफलता मनुष्य को कुछ सिखाती है। जैसे यह कि अगली बार भी वह शायद असफल होगा।
सभ्यता ईश्वर की भूलों को सुधारने और उसके मज़ाक़ों पर रोक लगाने का साझा प्रयास है।
यह मानना कठिन है कि कोई मनुष्य सच बोल रहा है, जब तुम जानते हो कि उसकी जगह तुम झूठ बोलते।
अंतरात्मा: वह भीतरी आवाज़ जो हमें चेताती है कि शायद कोई देख रहा हो।
सभी मनुष्य धोखेबाज़ हैं। उनमें अंतर बस इतना है कि कुछ इसे मानते हैं। मैं स्वयं इसे नकारता हूँ।
उसने आठ खंड लिखे हैं। इससे अच्छा होता कि वह आठ पेड़ लगाता या आठ बच्चे पैदा करता।